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322 साल पहले हुई थी भविष्यवाणी, अब थर-थरा रहे लोग, महान साइंटिस्ट ने बताई थी तबाही की डेट!

 


दुनिया के महान वैज्ञानिकों में गिने जाने वाले सर आइजैक न्यूटन का नाम आते ही सबसे पहले गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत और गति के तीन नियम याद आते हैं। लेकिन इन दिनों न्यूटन किसी वैज्ञानिक खोज की वजह से नहीं, बल्कि दुनिया के अंत को लेकर की गई एक पुरानी भविष्यवाणी के कारण फिर चर्चा में हैं। सोशल मीडिया पर दावा किया जा रहा है कि न्यूटन ने अपनी निजी नोटबुक में वर्ष 2060 को वर्तमान विश्व व्यवस्था के अंत का समय बताया था। चूंकि वर्ष 2060 अब बहुत दूर नहीं है, इसलिए इस विषय पर लोगों के बीच जिज्ञासा और बहस दोनों बढ़ गई हैं।

हालांकि, यह समझना बेहद जरूरी है कि न्यूटन की यह गणना किसी वैज्ञानिक प्रयोग या आधुनिक वैज्ञानिक मॉडल पर आधारित भविष्यवाणी नहीं थी। यह उनके धार्मिक ग्रंथों, विशेष रूप से बाइबिल की व्याख्या और व्यक्तिगत गणनाओं पर आधारित थी। वैज्ञानिक समुदाय इसे दुनिया के अंत की प्रमाणित भविष्यवाणी नहीं मानता।

1704 की नोटबुक में क्या लिखा था?

ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, न्यूटन ने वर्ष 1704 में अपनी निजी नोटबुक में बाइबिल के कुछ अध्यायों की व्याख्या करते हुए समय-गणना की थी। उन्होंने विशेष रूप से Book of Daniel और Book of Revelation में वर्णित "Time, Times and Half a Time" जैसी अवधारणाओं का अध्ययन किया।

इन्हीं धार्मिक संदर्भों के आधार पर उन्होंने 1260 वर्षों की अवधि की गणना की और निष्कर्ष निकाला कि वर्तमान विश्व व्यवस्था का अंत वर्ष 2060 के आसपास हो सकता है।

उनकी लिखावट में यह भी उल्लेख मिलता है कि यह घटना 2060 से पहले होने का कोई कारण नहीं दिखाई देता, लेकिन यह बाद में भी हो सकती है।

यानी न्यूटन ने स्वयं भी इसे निश्चित तिथि के रूप में प्रस्तुत नहीं किया था।

क्या सचमुच दुनिया खत्म होने की बात कही थी?

सोशल मीडिया पर अक्सर यह दावा किया जाता है कि न्यूटन ने 2060 में पृथ्वी के पूरी तरह नष्ट हो जाने की भविष्यवाणी की थी। लेकिन इतिहासकारों और न्यूटन पर शोध करने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि यह व्याख्या पूरी तरह सही नहीं है।

कई विशेषज्ञों के अनुसार न्यूटन "दुनिया का अंत" से आधुनिक अर्थों में पृथ्वी के विनाश की बात नहीं कर रहे थे। उनका आशय संभवतः पुरानी धार्मिक या राजनीतिक व्यवस्था के समाप्त होने और नई आध्यात्मिक व्यवस्था की शुरुआत से था।

इसलिए उनकी लिखी बातों को शाब्दिक रूप से ग्रहण करना उचित नहीं माना जाता।

विज्ञान और धर्म दोनों में था गहरा विश्वास

आइजैक न्यूटन केवल वैज्ञानिक ही नहीं थे, बल्कि धर्म और दर्शन के भी गंभीर अध्येता थे। उन्होंने बाइबिल पर हजारों पन्नों के नोट्स लिखे थे।

उनका मानना था कि ईश्वर ने ब्रह्मांड को निश्चित नियमों के अनुसार बनाया है और विज्ञान उन नियमों को समझने का माध्यम है।

यही कारण था कि वे वैज्ञानिक शोध के साथ-साथ धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन में भी काफी समय बिताते थे।

इतिहासकार बताते हैं कि न्यूटन ने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा धर्मशास्त्र, इतिहास और बाइबिल की व्याख्या में लगाया था।

कैसे पहुंची गणना 2060 तक?

न्यूटन ने बाइबिल में वर्णित 1260 दिनों को प्रतीकात्मक रूप से 1260 वर्षों के बराबर माना।

इसके बाद उन्होंने इस अवधि की शुरुआत मध्यकालीन यूरोपीय इतिहास की एक विशेष घटना से जोड़कर की। इसी गणना के आधार पर वे वर्ष 2060 तक पहुंचे।

यह पूरी प्रक्रिया धार्मिक और ऐतिहासिक व्याख्या पर आधारित थी, न कि खगोल विज्ञान, भौतिकी या गणित के किसी ऐसे सिद्धांत पर जिसे आधुनिक विज्ञान स्वीकार करता हो।

आज फिर क्यों वायरल हो रही है यह भविष्यवाणी?

पिछले कुछ वर्षों में दुनिया ने कई बड़े संकट देखे हैं।

जलवायु परिवर्तन, वैश्विक तापमान में वृद्धि, प्राकृतिक आपदाएं, महामारी, युद्ध, परमाणु हथियारों की बढ़ती चिंता और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के तेजी से विकास ने लोगों के मन में भविष्य को लेकर अनेक सवाल खड़े कर दिए हैं।

ऐसे माहौल में जब भी किसी प्रसिद्ध वैज्ञानिक या भविष्यवक्ता की पुरानी भविष्यवाणी सामने आती है, वह सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल होने लगती है।

न्यूटन की 2060 वाली गणना भी इसी कारण फिर चर्चा में है।

क्या वैज्ञानिक इस भविष्यवाणी को मानते हैं?

आधुनिक वैज्ञानिक समुदाय का स्पष्ट मत है कि पृथ्वी या मानव सभ्यता के अंत की कोई प्रमाणित वैज्ञानिक तिथि मौजूद नहीं है।

विज्ञान किसी भी ऐसी भविष्यवाणी को स्वीकार नहीं करता जो धार्मिक व्याख्या या व्यक्तिगत विश्वास पर आधारित हो।

वैज्ञानिकों का कहना है कि पृथ्वी के भविष्य का आकलन खगोल विज्ञान, जलवायु विज्ञान, भूविज्ञान और अन्य वैज्ञानिक अध्ययनों के आधार पर किया जाता है।

अब तक ऐसा कोई वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है जो यह सिद्ध करे कि वर्ष 2060 में पृथ्वी का अंत हो जाएगा।

न्यूटन के विशेषज्ञ क्या कहते हैं?

न्यूटन के जीवन और कार्यों का अध्ययन करने वाले कई विशेषज्ञों का कहना है कि उनके धार्मिक विचारों को अक्सर गलत तरीके से प्रस्तुत किया जाता है।

उनके अनुसार न्यूटन अपने समय के ऐसे विद्वान थे जो विज्ञान और धर्म को विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक मानते थे।

उनकी धार्मिक गणनाओं को वैज्ञानिक निष्कर्ष समझना उचित नहीं होगा।

पहले भी आती रही हैं दुनिया के अंत की भविष्यवाणियां

यह पहला अवसर नहीं है जब दुनिया के अंत को लेकर किसी विशेष वर्ष की चर्चा हुई हो।

इससे पहले भी अलग-अलग समय पर कई भविष्यवाणियां सामने आ चुकी हैं।

2012 में माया सभ्यता के कैलेंडर को लेकर पूरी दुनिया में बड़ी चर्चा हुई थी। उस समय भी दावा किया गया था कि दुनिया समाप्त हो जाएगी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।

इसी तरह विभिन्न धार्मिक और ज्योतिषीय भविष्यवाणियां समय-समय पर सामने आती रही हैं, लेकिन उनमें से किसी की भी वैज्ञानिक पुष्टि नहीं हुई।

सोशल मीडिया पर बढ़ रही हैं अफवाहें

विशेषज्ञों का कहना है कि सोशल मीडिया पर अधूरी जानकारी बहुत तेजी से फैलती है।

अक्सर किसी पुराने दस्तावेज का केवल एक हिस्सा साझा किया जाता है, जबकि उसका पूरा संदर्भ लोगों तक नहीं पहुंचता।

न्यूटन की 2060 वाली भविष्यवाणी के साथ भी कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है। कई पोस्ट इसे दुनिया के निश्चित अंत की घोषणा की तरह प्रस्तुत कर रही हैं, जबकि मूल दस्तावेज की व्याख्या कहीं अधिक जटिल और संदर्भ आधारित है।

क्या सचमुच डरने की जरूरत है?

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की ऐतिहासिक भविष्यवाणियों को अध्ययन और इतिहास के दृष्टिकोण से देखना चाहिए, न कि भय फैलाने वाले दावों के रूप में।

वर्ष 2060 को लेकर फिलहाल ऐसा कोई वैज्ञानिक प्रमाण मौजूद नहीं है जिससे यह कहा जा सके कि उस वर्ष पृथ्वी समाप्त हो जाएगी।

हालांकि, जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण संरक्षण, वैश्विक शांति, महामारी की रोकथाम और तकनीक के जिम्मेदार उपयोग जैसे वास्तविक मुद्दे आज मानवता के सामने गंभीर चुनौतियां हैं। इन पर ध्यान देना अधिक आवश्यक है।

सर आइजैक न्यूटन का विज्ञान में योगदान अमूल्य है और उनके सिद्धांत आज भी आधुनिक विज्ञान की मजबूत नींव माने जाते हैं। लेकिन वर्ष 2060 को लेकर उनकी चर्चा वैज्ञानिक भविष्यवाणी नहीं, बल्कि धार्मिक ग्रंथों की उनकी व्यक्तिगत व्याख्या का परिणाम थी। इसलिए इसे दुनिया के निश्चित अंत की घोषणा मानना सही नहीं होगा।

इतिहास हमें यह जरूर सिखाता है कि महान वैज्ञानिक भी अपने समय की धार्मिक और दार्शनिक मान्यताओं से प्रभावित थे। ऐसे में न्यूटन की इस गणना को वैज्ञानिक तथ्य के बजाय एक ऐतिहासिक और धार्मिक दस्तावेज के रूप में देखना अधिक उचित होगा। फिलहाल दुनिया के वर्ष 2060 में समाप्त होने का कोई प्रमाणित वैज्ञानिक आधार उपलब्ध नहीं है, इसलिए इस तरह के दावों को समझदारी और तथ्यों के साथ परखना आवश्यक है।

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